01. अंहकार एक हिंदी लघु कहानी
अहकार
एक मूर्तिकार ने अपने बेटे को मूर्तिकला सिखाने का निश्चय किया । बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा और ठीक-ठाक मूर्तियां बनाने लगा। अब दोनों साथ में अपनी मूर्तियां बेचने बाजार जाते ।
शुरू शुरू में मूर्तिकार की मूर्तियां डेढ़-दो रुपए में बिकती पर बेटे की मूर्तियों का मूल्य आठ-दस आने से ज्यादा ना मिलता।
बाजार से आने के बाद मूर्तिकार अपने बेटे को पास बिठाता और मूर्ति बनाने में होने वाली त्रुटियों के बारे में बताता और अगले दिन उस गलती को सुधारने के लिए समझाता । बच्चा मूर्ति में सुधार करता।
यह क्रम कई सालों तक चला। लड़का अब काफी समझदार हो गया। मूर्तिकार का बेटा अपनी कला में सुधार करने का प्रयत्न करता रहा।
कुछ समय बाद उस लड़के की मूर्तियां भी पिता की मूर्तियों की कीमत के बराबर डेढ़ रुपए तक में बिकने लगी। मूर्तिकार अब भी अपने बेटे को छोटे बच्चे की तरह समझाता और मूर्ति बनाने में होने वाली गलती के बारे में अपने बेटे को बताता रहता।
बेटे ने अपनी कला पर और भी अधिक ध्यान दिया और उसकी कला और भी अधिक निखारने लगी।
अब मूर्तिकार के बेटे की मूर्तियां पिताजी दुगनी तकनीकी मच मैं लगभग पांच रुपए तक बिकने लगी। लेकिन मूर्तिकार ने अपने बेटे की कला को सुधारने का क्रम बंद नहीं किया।
अब बेटे को लगा कि उसे सब कुछ आ गया है तो एक दिन बेटे ने झुंझलाकर कहा, 'आप तो दोष निकालना बंद ही नहीं करते। मेरी कला अब तो आप से भी अच्छी हो गयी है। मुझे मेरी मूर्तियों के लिए पांच रुपए तक मिल जाते हैं लेकिन आपकी मूर्तियों की कीमत अब भी दो-ढाई रुपए ही है।'
मूर्तिकार ने अपने बेटे को समझाते हुए कहा, ''बेटा ! जब में तुम्हारी उम्र का था तब मुझे मेरी कला का अहंकार हो गया था और फिर मौंने अपनी कला में सुधार की बात छोड़ दी। ऐसा करने पर मेरी प्रगति रुक गयी और में दो रुपए से अधिक की मूर्तियां ना बना सका।"
बेटे को अपनी गलती का एहसास हो गया वह हाथ जोड़कर बुल पिताजी मुझसे गलती हो गई मुझे अपनी मूर्तियों को और भी कीमती बनाना है।"
पिता ने कहा, "बेटा ! अपनी गलतियों को समझने और उसे सुधारने के लिए हमेशा तैयार रहो ताकि बहुमूल्य मूर्तियां बनाने वाले श्रेष्ठ मूर्तिकारों की श्रेणी में पहुंच सको ।'
एक दिन वह बच्चा राज्य का सबसे श्रेष्ठ मूर्तिकार बन गया और उसे वहां के राजा ने इनाम देकर सम्मानित किया।
Comments
Post a Comment